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"न्याय के प्रवर्तक अक्षपाद श्री महर्षि गौतम"
* वह शास्त्र जिसमें किसी वस्तु के यथार्थ
ज्ञान के लिये विचारों की उचित योजना का निरुपण होता है, न्यायशास्त्र कहलाता है । वर्तमान समय में विश्व में उपस्थित कानून प्रणाली प्रत्यक्ष अथवा
परोक्ष रूप से इसी शास्त्र पर आधारित है । वैदिक ऋषि गौतम (व्यक्तिगत नाम अक्षपाद) ने भगवान शिव के आदेश पर इस शास्त्र की रचना की ताकि आने वाले समय
में जब प्रत्येक व्यक्ति सत्य की अलग अलग प्रकार से व्याख्या करेंगे तब सत्य तक पहुँचने हेतु यह तार्किक प्रणाली उपयोगी सिद्ध होगी । इसका वर्णन
शिव महापुराण में मिलता है
।
- महर्षि गौतम परम तपस्वी एवं संयमी थे। महाराज वृद्धाश्व की पुत्री अहिल्या
इनकी पत्नी थी ।
गौतम ऋषि के न्याय दर्शन में सोलह तथ्यों का
उल्लेख प्राप्त होता है
-प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डाहेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानाम्तत्त्वज्ञानात निःश्रेयसाधिगमः
- जिसमें प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धात, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह स्थान हैं. न्याय चार तरह के
प्रमाणों की चर्चा करता है-:
अनुभूति (प्रत्यक्ष), अर्थ निकालना
(अनुमान), तुलना करना (उपमान) और शब्द (साक्य)।
अप्रामाणिक ज्ञान में स्मृति, शंका, भूल और काल्पनिक वाद-विवाद शामिल हैं।
न्यायदर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द - ये
चार प्रमाण माने गए
हैं।
प्रत्यक्ष का अर्थ है इंद्रियों के साथ सीधा
संपर्क होना, अर्थात स्वयं सुनना, देखना, चखना आदि।
निष्कर्ष तक पहुंचने का जो साधन हो, उसे अनुमान कहते हैं।
एक वस्तु से दूसरे वस्तु की तुलना कर उसका ज्ञान
होना उपमान कहलाता है।
यथार्थ वाक्य या विद्वानों की कही हुई बातें
शब्द प्रमाण कहलाती हैं।
- प्रमाण के द्वारा हम अपने अनुभव के सही या गलत होने का विश्लेषण कर सकते हैं। दर्शन केवल बडे दार्शनिकों के बीच संवाद न
होकर संपूर्ण समाज के सोचने-समझने का तरीका है। वाद का अर्थ है-ज्ञान प्राप्ति के लिए की जाने वाली बहस। जिस बहस में जीतना ही उद्देश्य
हो, उसे विवाद कहते हैं। यदि हार की संभावना के कारण बहस का उद्देश्य भटक
जाए, तो उसे वितंडा कहा जाता है। हेत्वाभास का अर्थ है किसी कारण का दिया
जाना, जो कारण लगता है, लेकिन यथार्थ में वह कारण नहीं है। शब्द की
विभिन्न वृत्तियों को उलट कर यदि उसके द्वारा किसी बात का विरोध किया जाए, तो वह छल कहा जाता है।
इस तरह, न्याय तर्क के द्वारा सत्य तक पहुंचने का मार्ग है।
- प्रत्यक्ष प्रमाण इन्द्रियों का विषय के साथ संबंध
होने पर जो ज्ञान मिलता है, जो शब्दात्मक नहीं
होता अर्थात जिसमे बात की कोई आवश्यकता नही क्योकि जो आँखों द्वारा प्रत्यक्ष देखा गया हो वह सर्व
श्रेष्ठ है ।
तथा जो बाद में खंडित या बाधित न होने वाला
निश्चयात्मक ज्ञान होता है, वही प्रत्यक्ष है।
- अनुमान प्रमाण प्रत्यक्ष के बाद गौतम ने अनुमान का वर्णन किया है। गौतम के अनुसार अनुमान तीन प्रकार का है- पूर्ववत्, शेषवत और सामान्यतोदृष्ट।
इसके अंतर्गत भूतकाल तथा वर्तमान काल की परिस्थितियों के आधार पर भविष्य का
अनुमान लगाया जाता है जैसे :
कि वर्तमान में आसमान
में बादल घिरे हुए देखकर हम अनुमान लगाते हैं कि अब बारिश होगी। और अनुमान विधि के द्वारा यह
बात कदाचित ठीक ही बेठती है ।
धुएं को देख कर ये अनुमान लगाना की यहाँ निश्चय ही आग लगी होगी आदि ।
- जिसमें वर्तमान वस्तु स्थिति का ही एकदेश देखकर उसके अवशिष्ट देश के सम्बन्ध में अनुमान किया जाता है, वह शेषवत अनुमान है। जैसे कि समुद्र की एक
बूँद चखकर समुद्र का सारा पानी खारा है, ऐसा अनुमान। जिस अनुमान में दिये जाने वाले प्रत्यक्ष दृष्ट उदाहरण साध्य के साक्षात
उदाहरण नहीं है, साध्य की जाति के नहीं हैं, बल्कि साध्य के सदृश हैं, वह अनुमान सामान्य यानी सादृश्य पर आधारित होने के कारण सामान्यतोदृष्ट कहलाता है, बल्कि साध्य का दर्शन सादृश्य के माध्यम से ही हो सकता है। जैसे कि चंद्र की गति हम प्रत्यक्षत: नहीं देख सकते, लेकिन चंद्र अपना स्थान बदलता है, इतना हम देख सकते हैं। इस स्थानान्तरण से हम अनुमान लगाते हैं कि
चंद्र ज़रूर गतिमान है। उसी प्रकार ज्ञानेन्द्रियों का प्रत्यक्ष ज्ञान हमें कभी नहीं होता है, बल्कि दूसरे क्रियासाधकों के साथ सादृश्य जानकर ज्ञान
साधन के रूप में हम सिर्फ़ उनका अनुमान ही कर सकते हैं।
- उपमान प्रमाण तीसरा उपमान प्रमाण है। उपमान किसी अप्रसिद्ध वस्तु की ऐसी जानकारी है, जो प्रसिद्ध वस्तु के साथ उसका साधर्म्य जानकर होती है। जैसे हमें अगर
गवय नामक प्राणी की जानकारी न हो और हमें किसी सत्य वक्ता ने बताया हो कि गवय बैल होता है, तो उसके बताए हुए सादृश्य के आधार पर हम गवय को पहचान सकते
हैं।
- प्रमाण का चोथा प्रकार शब्द (बात ।वार्ता ) है, जो आप्त (यथार्थवक्ता) का वचन है। शब्द प्रमाण आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, (पंच ज्ञानेन्द्रिय), अर्थ (रूपरसगन्धस्पर्शशब्द) बुद्धि (ज्ञान), मनस, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव (मरणोत्तर अस्तित्व) फल, दु:ख और अपवर्ग (मोक्ष) यह बारह प्रमेय हैं। इनके स्वरूप का ज्ञान अपवर्ग के लिए उपयोगी है।
गौतम मानते हैं कि अपवर्ग के लिए सर्वप्रथम मिथ्या ज्ञान का नाश होना चाहिए। उसी से काम, क्रोधादि दोषों का नाश हो सकता है। उससे कर्म के प्रति
प्रवृत्ति का नाश होगा तथा प्रवृत्ति नाश से हीपुनर्जन्म श्रृंखला खंडित होगी। पुनर्जन्म श्रृंखला खंडित होने से ही दु:ख का नाश होगा और दु:ख नाश ही
अपवर्ग का स्वरूप है।
उपरोक्त वर्णन केवल प्रमाण के चार प्रकारों का संक्षिप्त वर्णन है इसके अतिरिक्त श्री गौतम ने प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धात, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह आदि पर भी पूर्ण वर्णन समाज कल्याण हेतु न्यायशास्त्र के
रूप में दिया ।